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Nainan Mein Aan-Baan / नैनन में आन-बान

Nainan Mein Aan-Baan / नैनन में आन-बान

Shastriya Sangetagyon Ki Aalapchari / शास्त्रीय संगीतज्ञों की आलापचारी

Yatindra Mishra / यतीन्द्र मिश्र
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Paperback / Hardback

शास्त्रीय और लोक संगीत को समावेशी ढंग से समझने के लिए यह किताब एक मार्गदर्शी है। यहाँ परंपरा और नवाचार के मध्य उस महीन फाँक को सहेजने का जतन किया गया है, जो हमारी पारंपरिक प्रदर्शनकारी कलाओं और भारतीय परंपरा के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। यह पुस्तक बारह मूर्धन्य शास्त्रीय गायकों के सांगीतिक स्वरूप को समझने का वैचारिक प्रयास है, जिसमें केसरबाई केरकर, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, उस्ताद अमीर ख़ाँ, पंडित भीमसेन जोशी, बेगम अख़्तर, पंडित कुमार गंधर्व, गंगूबाई हंगल, गिरिजा देवी, किशोरी अमोनकर और पंडित जसराज शामिल हैं।
पुस्तक उस मार्ग पर भी जाती है, जहाँ देसी और मार्गी, शास्त्रीय और लोक से लेकर फिल्म संगीत की ज्यामिति में परंपराएँ साँस लेती हैं। यहाँ अयोध्या की सांगीतिक परंपरा और अवध क्षेत्र से लेकर पुष्टिमार्गीयों का हवेली संगीत और बृजमंडल का सलोना उत्सव, ओडिसी नृत्य और भरतनाट्यम की वैचारिक छवियाँ, बाईयों का ज़माना और उपशास्त्रीय गायन के प्रकारों ठुमरी, टप्पा, चैती, कजरी से लेकर ध्रुपद की विवेचना, रागदारी का शिल्प, सभी कुछ मौजूद हैं।
इस किताब में, एक ओर राग मालगूँजी या देव गंधार की पुकार है, तो दूसरी तरफ कर्नाटक शैली में गाए जाने वाले भजन-कृष्णानी बेगने बारो की गूँज सुनाई देती है।

Imprint: Penguin Swadesh

Published: Feb/2026

ISBN: 9780143481812

Length : 208 Pages

MRP : ₹399.00

Nainan Mein Aan-Baan / नैनन में आन-बान

Shastriya Sangetagyon Ki Aalapchari / शास्त्रीय संगीतज्ञों की आलापचारी

Yatindra Mishra / यतीन्द्र मिश्र

शास्त्रीय और लोक संगीत को समावेशी ढंग से समझने के लिए यह किताब एक मार्गदर्शी है। यहाँ परंपरा और नवाचार के मध्य उस महीन फाँक को सहेजने का जतन किया गया है, जो हमारी पारंपरिक प्रदर्शनकारी कलाओं और भारतीय परंपरा के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। यह पुस्तक बारह मूर्धन्य शास्त्रीय गायकों के सांगीतिक स्वरूप को समझने का वैचारिक प्रयास है, जिसमें केसरबाई केरकर, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, उस्ताद अमीर ख़ाँ, पंडित भीमसेन जोशी, बेगम अख़्तर, पंडित कुमार गंधर्व, गंगूबाई हंगल, गिरिजा देवी, किशोरी अमोनकर और पंडित जसराज शामिल हैं।
पुस्तक उस मार्ग पर भी जाती है, जहाँ देसी और मार्गी, शास्त्रीय और लोक से लेकर फिल्म संगीत की ज्यामिति में परंपराएँ साँस लेती हैं। यहाँ अयोध्या की सांगीतिक परंपरा और अवध क्षेत्र से लेकर पुष्टिमार्गीयों का हवेली संगीत और बृजमंडल का सलोना उत्सव, ओडिसी नृत्य और भरतनाट्यम की वैचारिक छवियाँ, बाईयों का ज़माना और उपशास्त्रीय गायन के प्रकारों ठुमरी, टप्पा, चैती, कजरी से लेकर ध्रुपद की विवेचना, रागदारी का शिल्प, सभी कुछ मौजूद हैं।
इस किताब में, एक ओर राग मालगूँजी या देव गंधार की पुकार है, तो दूसरी तरफ कर्नाटक शैली में गाए जाने वाले भजन-कृष्णानी बेगने बारो की गूँज सुनाई देती है।

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