
समर्थावरी अहंता। अंतरीं मानी मानी समता।
सामर्थ्येंवी करी सत्ता। तो येक मूर्ख।।
एक प्रकार का मूर्ख वह होता है, जो समर्थ व्यक्ति के सामने अहंकार से पेश आए, अपने आपको उसके बराबर समझे और पूरी क्षमता के बिना अपना अधिकार जमाए।
महाराष्ट्र के ओजस्वी संत-कवि समर्थ रामदास छत्रपति शिवाजी के समकालीन थे और उन्होंने अन्याय, अत्याचार और दासता के विरोध में आवाज़ उठाई थी। भारतीय संत ने मनुष्य की उन् नति के लिए वचनामृत को काव्य में ढाला और जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ दासबोध में राजनीति पर भी विचार प्रकट किए। इस पुस्तक में समर्थ रामदास का जीवन परिचय एवं दासबोध का सरल हिन्दी रूपांतरण दिया गया है।
Imprint: Hind Pocket Books
Published: Feb/2023
ISBN: 9780143460848
Length : 152 Pages
MRP : ₹250.00