Publish with us

Follow Penguin

Follow Penguinsters

Follow Hind Pocket Books

Shubhda/शुभदा

Shubhda/शुभदा

Sharatchandra/शरतचन्द्र
Select Preferred Format
Buying Options
Paperback / Hardback

वह आकर बोला, अपने संदूक की चाभी दे।’ गला बड़ा मोटा था – भारी। अचानक, सुनते ही ख़्याल होता था, मानो कोशिश करके वह ऐसा भारी गले से बोल रहा था। शुभदा कुछ नहीं बोली।
उसने फिर वैसे ही स्वर में, लाठी को फिर एक बार ज़मीन पर पटककर कहा, ‘चाभी दे, नहीं तो गला दबाकर मार डालूँगा।’
अब शुभदा उठ बैठी । तकिए के नीचे से चाभियों का गुच्छा निकालकर पास ही फें ककर धीरे-धीरे शांत भाव से बोली, मेरे बड़े सन्दूक के दाहिनी ओर के खाने में पचास रुपए का नोट हैकृवही लेना। बाईं ओर विश्वनाथ बाबा का प्रसाद है, उसपर कहीं हाथ न डालना।’ जिस तरह शांत भाव से उसने यह सब कह डाला, उससे यह नहीं मालूम होता था कि उसे अब रत्तीभर भी डर लग रहा है। शुभदा एक ऐसी नारी की मार्मिक कथा है जो गरीबी की यातनाएंॅ भोगते हुए अपने नशेड़ी पति के प्रति समर्पिता ही नहीं, बल्कि स्वाभिमानिनी भी है – शुभदा और उसकी विधवा बेटी के माध्यम से शरत् बाबू ने नारी वेदना की गहन अभिव्यक्ति की है। संभवतया इसी कारण उन्हें ‘नारी वेदना का पुरोहित’ कहा जाता है। 

Imprint: Penguin Swadesh

Published: Jan/2024

ISBN: 9780143465447

Length : 202 Pages

MRP : ₹199.00

Shubhda/शुभदा

Sharatchandra/शरतचन्द्र

वह आकर बोला, अपने संदूक की चाभी दे।’ गला बड़ा मोटा था – भारी। अचानक, सुनते ही ख़्याल होता था, मानो कोशिश करके वह ऐसा भारी गले से बोल रहा था। शुभदा कुछ नहीं बोली।
उसने फिर वैसे ही स्वर में, लाठी को फिर एक बार ज़मीन पर पटककर कहा, ‘चाभी दे, नहीं तो गला दबाकर मार डालूँगा।’
अब शुभदा उठ बैठी । तकिए के नीचे से चाभियों का गुच्छा निकालकर पास ही फें ककर धीरे-धीरे शांत भाव से बोली, मेरे बड़े सन्दूक के दाहिनी ओर के खाने में पचास रुपए का नोट हैकृवही लेना। बाईं ओर विश्वनाथ बाबा का प्रसाद है, उसपर कहीं हाथ न डालना।’ जिस तरह शांत भाव से उसने यह सब कह डाला, उससे यह नहीं मालूम होता था कि उसे अब रत्तीभर भी डर लग रहा है। शुभदा एक ऐसी नारी की मार्मिक कथा है जो गरीबी की यातनाएंॅ भोगते हुए अपने नशेड़ी पति के प्रति समर्पिता ही नहीं, बल्कि स्वाभिमानिनी भी है – शुभदा और उसकी विधवा बेटी के माध्यम से शरत् बाबू ने नारी वेदना की गहन अभिव्यक्ति की है। संभवतया इसी कारण उन्हें ‘नारी वेदना का पुरोहित’ कहा जाता है। 

Buying Options
Paperback / Hardback

Sharatchandra/शरतचन्द्र

शरत्‌चन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघु कथाकार थे। उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का वर्णन है। इसके अलावा उनकी रचनाओं में तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। शरत्‌चन्द्र भारत के सार्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक हैं। 16 जनवरी 1938 ई. को कलकत्ता में 62 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। 

More By The Author

Path Ke Davedar/पथ के दावेदार

Path Ke Davedar/पथ के दावेदार

Sharatchandra/शरतचन्द्र
Korel/कोरेल

Korel/कोरेल

Sharatchandra/शरतचन्द्र
Grihdah/गृहदाह

Grihdah/गृहदाह

Sharatchandra/शरतचन्द्र
error: Content is protected !!